एकदंताय वक्रतुण्डाय गौरीतनयाय धीमहि ।
गजेशानाय भालचन्द्राय श्रीगणेशाय धीमहि ॥
देवों के देव महादेव हम सभी के आराध्य के पुत्र के रूप में जाने जाने वाले भगवान गणेश का आज आगमन है। भगवान गणेश के जन्म और उनके कार्यों से संबंधित अनेकानेक कथाएं प्रचलित हैं। यूं तो उनकी उत्पत्ति माता पार्वती के संरक्षक के रूप में हुई लेकिन आज इस जगत में वह हम सभी के कलेशों को काटने वाले विघ्नहर्ता के रूप में विद्यमान हैं। जग के समान सुड़ और एक दंत रखने वाले भगवान एकदंताय का सुंदर चरित्र हमारे जीवन को ये प्रेरणा देता है कि हमारा आलोक और हमारी प्रसिद्धि हमारे मुख मंडल से नहीं हमारे चरित्र से आलौकिक होती है।
गणेश चतुर्थी मुख्य रूप से भारत के महाराष्ट्र प्रांत में भव्य रूप से मनाया जाने वाला उत्सव है किन्तु धीरे-धीर सम्पूर्ण भारत में जगह जगह इसका प्रचलन बढ़ रहा है। मुख्यतः महाराष्ट्र में आज के दिन गणेश जी की स्थापना कर दस दिन तक उनके पूजन का आयोजन करते हैं उन्हें पुष्प मालाओं से सुसज्जित कर उनके प्रिय व्यंजन मोदक का भोग लगाते हैं और गीत संगीत का आयोजन करते हैं
कहते हैं जो भी व्यक्ति भगवान गणेश का पूजन करता है उसके जीवन में शुभता का वास होने लगता है। ऐसे व्यक्ति के घर परिवार में कभी दरिद्रता नहीं आती है। गणेश जी की कृपा से उनकी आराधना करने वाले घरों में सदा मांगलिकता रहती है। किसी भी प्रकार का दुख, परेशानी, असफलता और कठिन परिस्थितियां ऐसे परिवार में नहीं आती हैं, और इसी कामना के साथ हम दसवें दिन उनका विसर्जन कर देते हैं। आज कल कुछ लोग दो दिन या तीन दिन में भी भगवान की स्थापना के उनका विसर्जन भी कर देते हैं।
मेरे अनुसार गणपति स्थापना एक दिन की हो, दो या दस दिन की भगवान के भव्य उत्सव से बड़ा है हमारे मन का संकल्प की हमने जिन्हें अपने प्रभु के रूप में मन से स्वीकार किया है क्या वास्तव में हम उनके गुड़ों को उनकी कर्तव्य परायणता को और माता पिता के प्रति आदर भाव को जीवन में अपनाना चाहते हैं या सिर्फ उत्सव करके या शोर मचा के ये दिखावा करते हैं कि हम भगवान गणेश के परम भक्त हैं। इसलिए भगवान की स्थापना सिर्फ अपने मंदिरों और पंडालों में ही नहीं हमारे ह्रदय और चरित्र में भी होनी चाहिए तभी हमारे और समाज के विघ्नों का नाश हो पाएगा और विघ्न विनाशक की सच्ची स्थापना हो पाएगी।
जाह्नवी श्रीवास्तव








































