– प्रो. अमिताभ श्रीवास्तव
हाईवे पर भागती सभी सर्राटा कारें अचानक मस्त-मद्धम बैलगाड़ी में तब्दील हो जाएं? एक्सपीरिएंस तो चकाचक होगा। मिट्टी की महक, हवा की हल्की बयार और सौ टका गंवई अहसास- इनकी तुलना के लिए षहर की डिक्षनरी में कोई षब्द नहीं बना । गांव में खाट पर पैर पसार कर बतियाने का सुख कभी लिया है न? चलिये? जहां भी हो पैर पसारिये। पेट पर लैपटाप रखकर तैयार हो जाइये। वेब सीरीज पंचायत फिर आ गयी है। गांव के सौ टका मस्त अहसास की गारंटी।
जिन्होंने अमेजन प्राइम पर पहला सीजन न देखा हो उनके लिए क्विक लुक। बकियन के लिए रिवीजन। यूपी के बलिया जिले का गांव फुलेरा। वहां पंचायत सचिव के तौर पर एक ऐसा यूथ अभिशेक उर्फ ओटीटी के अमोल पालेकर जितेन्द्र आते है। मल्टीनेषनल में जाॅब की प्रिपरेषन कर रहा है यह युवा। जिस नजर से वह गांव को देखता है वह यूथ व्यू प्वाइंट से गांव का नजारा दिखाती है। सचिव जी के दो चिंटू हैं विकास और प्रहलाद पांडे-गांव के टांजिस्टर-टीवी कुछ कह लीजिये। गांव का देखा सुना उन्हीें की जुबानी होता है। प्रधानपति है पुराने मुंगेरी लाल यानी रघुबीर यादव। खाउ नहीं है, पर जुगाड़ पक्का सेट कर रखा है। तकरीबन हर गांव की तरह यहां कागज पर लिखा प्रधानपति का है और अंगूठा प्रधान का। यानी नीना गुप्ता का। टीवी की षुरुआत में खानदानी कार्पोरेटी रहीं नीना का गंवई अवतार जमीन से जुड़े धारावाहिकों की जान रहा है। वैसे यहां कोई हीरो विलेन नहीं सब इंसान है। कोई सषस्त्र क्रांति नहीं हो रहीं, पर बदलाव की कसक है। और जब यह हौले से होता है बरबस मुस्कान आ जाती है। प्रधान की एक बिटिया भी है,। गांव की टंकी के उपर चाय पीती जिसकी झलक मिली थी, मौका है उससे मुलाकात का। एक बनराकस उर्फ वनराक्षस है, फटा न भी हो फाड़ के टांग अड़ाने वाले। सपत्नीक सतत इस सामाजिक कार्य में सक्रिय। और फिर फुलटूस गाली देने में माहिर विधायक जी भी हें।
हल्की हल्की हवा सी ही चलती है कास्टिंग म्यूजिक। षायद वह वह लय पकड़ने की कोषिष करती है जिस पर बच्चिया अपने पैर हिलाती है बकरियां गरदन हिलाती है और नयी नयी मोबाइल धारी जिन्दगी से कदम ताल मिलाती है।
चुनावी चिरकुटई के बीच विकास
गांव के विकास की अपनी कहानी रहती है। किसी भी सरकार के किसी भी सरकारी विज्ञापन से अलग। एक दिन गांव को खुले में षौच से मुक्त गांव के लिए जो-जो किया जाता है, उसे देखने के बाद सुपरमैन और हीमैन अपने अवार्ड लौटा सकते हैं। इस बार पंचायत में ‘लोग क्या कहंेग’े के षाष्वत सवाल की भी कहानी है। चुनावी राजनीति की चिरकुटई इस बार पंचायत में खिल कर आयी है। नये नये नायक है और एक कड़ी की तो नायिका हैं मिस लौकी। आप हंस सकते हैं, कि पंचायत भवन में सीसीटीवी से बकरी खोजी जा रही है। और सोच पर चट से चपत पड़ती है। जब आप सुनते समझते हैं कि बकरी का दूध ही किसी का घर चला रहा है। और तब बकरी की खोज एक राखी सावंत के लिए दूल्हा खोजने से ज्यादा बड़ा काम बन जाता है। जब बकरी लौट कर आती है , पर आप आप के चेहरे पर राहत भरी मुस्कान भी आती है। यह अलग बात पंचायत में एक अलहदा प्रजाति भी आपको मिलेगी जो सीसीटीवी पर खोई सेंडल खोजती है।
जात पात और दारू का समाजवाद
गांव हो और जात की जगलरी न हो? ये तो सिर्फ डीडीएलजे में हो सकता है। पंचायत के उप पधान और उप सचिव उर्फ चिंटू द्वय को यह डर सताए जा रहा है पंचायत सचिव महोदय को प्रधान की बिटिया जी से कहीं इष्क न हो जाए। हां, पंचायत सचिव नाच देखने जाए तो कोई दिक्क्त नहीं है। प्रधान साहब नाम से पहले नाम की पूंछ पहले पूछ लेते हैं। हां दारू वो किसी भी जात वाले के साथ पी लेते हैं। कैम्ब्रिज में इन्टरव्यू से अलग गांव की अपनी टेंषन है। सड़क धंसी है, गाड़ी फंसी है, नषा मुक्ति कर्मचारी दारू पीकर टुन्न है, पढ़ी लिखी लड़की के लिए अपनी जात का अवेलेबिल कम ईडियट लड़का ढूंढना है और इन्हीं के बीच कायदे की नौकरी जैसे जिन्दगी के संजीदा सवाल भी जिंदा है।
मनरेगा का टेंडर, पंचायत प्रधान का दखल, ठेकेदार की ठसक सब किस्म के मसाले पड़ते और फिर नाच का छौंका। ‘लड़की के बजाय लौंडा नचा दिया’ की अफवाह फैलती है और फिर लै जूता लै कुर्सी पटक । धारावाहिक देखिये तो लगेगा गांव की जिंदगी आइना देख रही है। जितना है उतना। कोई उत्तल अवतल लेंस नहीं जो छोटा या बड़ाकर दिखाए। न कोई मुद्दा आसमान में चढ़कर बैठा है, और न कोई दरी के नीचे सरकारा हुआ है। गांव ने भ्रश्टाचार, बेरोजगारी समेत देष भर के हंसते रोते मुद्दोें को जज्ब कर रखा है। और अंतिम कड़ी देखिये तो पता चल जाएगा कि असल देष भी गांव में क्यों जिंदा है।
मसलों की सूची आज भी बहुत लंबी है, सबके साथ जिंदगी ने मसाला भी मिक्स कर रखा है। पंचायत में भी किरदार आते हैं और मसलों को अपनी हैयियत के हिसाब से छूते हैं। कभी मामले को कोई छू के निकल जाता है, कोई बच के निकल जाता है, कभी कभार कोई मसले के नीचे दब जाता है तो कोई हीरो हाथ फैला कर आटो की तरह मामले को आगे बढने से रोक लेता है।
पंचायत में सरसों का खेत खोजने जाएंगे तो सारी। फिर उसी डीडीएलजे को तलाषिये जहां षाहरुख खान सिमरन से मिलने के लिए खुदाई अंदाज में बाहें उठाते थे। अपनी दुनिया अक्सर दूसरों की नजर से ही सही नजर आती है। श्रीलाल षुक्ल की राग दरबारी में गांव के बाहर ट्रक रुकता है, जिससे निकले युवा के जरिये गांव पर यह महान लेखक एक दर्द और व्यंग्य व्यंग्य भरी नजर डालता है। व्यंग्य वहां चुभता था, यहां यह मुस्कान बिखेर देता है। दौर बदलते हैं तो दस्तूर भी बदल जाते हैं। राग दरबारी साहित्य की धरोहर है लेकिन जब कभी भी देष में दृष्य श्रव्य कथ्य को साहित्य सरीखा दर्जा मिल सका, चंदन के लिखे और दीपक द्वारा निर्देषित पंचायत को मिस करना मुष्किल होगा। पंचायत हमारी जिंदगी से खो गये गांव से हमारी मुलाकात कराता हैं। अहसास कराता है, हम कहीं भी पहुंच जाएं हमारा गांव कहीं न कहीं हमारे अंदर ही जीता है।








































